हरिवंशराय बच्चन की 'मधुशाला' कविता के कुछ छंद!
मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला
'किस पथ मैं जाऊं?', असमंजस मैं है भोलाभाला,
अलग अलग पथ बतलाते सब पर मे ये बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा तू मधुशाला|
चलने ही चलने मे कितना जीवन, हाय, ये बिता डाला|
'दूर अभी है', पर, ये कहता है हर पथ बतलानेवाला|
हिम्मत है ना बढूँ आगे, साहस है ना फिरूं पीछे,
किंकर्त्तव्यविमुढ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला|
मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला
'किस पथ मैं जाऊं?', असमंजस मैं है भोलाभाला,
अलग अलग पथ बतलाते सब पर मे ये बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा तू मधुशाला|
चलने ही चलने मे कितना जीवन, हाय, ये बिता डाला|
'दूर अभी है', पर, ये कहता है हर पथ बतलानेवाला|
हिम्मत है ना बढूँ आगे, साहस है ना फिरूं पीछे,
किंकर्त्तव्यविमुढ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला|