Sunday, October 9, 2011

मधुशाला

हरिवंशराय बच्चन की 'मधुशाला' कविता के कुछ छंद!

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला
'किस पथ मैं जाऊं?', असमंजस मैं है भोलाभाला,
अलग अलग पथ बतलाते सब पर मे ये बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा तू मधुशाला|

चलने ही चलने मे कितना जीवन, हाय, ये बिता डाला|
'दूर अभी है', पर, ये कहता है हर पथ बतलानेवाला|
हिम्मत है ना बढूँ आगे, साहस है ना फिरूं पीछे,
किंकर्त्तव्यविमुढ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला|


Saturday, October 8, 2011

'कभी कभी' का एक नज़्म

कभी रस्ते मैं मिल जाओ तो कतराके गुज़र जाना
हमें इस तरह से तक ना जैसे पहचाना नहीं तुमने
हमारा ज़िक्र जब आये यूँ अनजान बनजना
के जैसे नाम सुन कर भी हमें जाना नहीं तुमने